
नई दिल्ली:
पिछले 12 वर्षों से कोमा में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हरीश राणा की किस्मत का फैसला अब देश की सबसे बड़ी अदालत में होगा। 13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि हरीश की जिंदगी को मेडिकल सपोर्ट के सहारे आगे बढ़ाया जाए या फिर परिवार की मांग पर उसे इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।
हरीश राणा एक हादसे के बाद सालों से कोमा में हैं। इस लंबे समय में न तो उन्हें होश आया और न ही उनकी सेहत में कोई सुधार हो सका। डॉक्टरों की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, उनके ठीक होने की संभावना बेहद कम बताई गई है। हरीश की सांसें मशीनों के सहारे चल रही हैं और पूरा परिवार पिछले 12 साल से मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक पीड़ा झेल रहा है।

सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि हरीश के माता-पिता ने भारी मन से अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की मांग की है। उनका कहना है कि यह जिंदगी नहीं, बल्कि एक लंबा और असहनीय कष्ट है। माता-पिता का तर्क है कि अगर हरीश को कभी होश में लौटने की उम्मीद नहीं है, तो उसे इस पीड़ा से मुक्त किया जाना चाहिए।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, डॉक्टरों की राय और माता-पिता की अंतिम सहमति सबसे अहम आधार होंगे। अदालत को यह तय करना है कि क्या ऐसे मामलों में जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी जा सकती है या नहीं।
यह मामला सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ा नैतिक और कानूनी सवाल बन चुका है—
क्या कोमा में पड़ी जिंदगी वास्तव में जीवन है, या फिर सम्मानजनक मौत ही सबसे बड़ा सुकून?
13 जनवरी को आने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला न सिर्फ हरीश राणा के भविष्य को तय करेगा, बल्कि इच्छामृत्यु से जुड़े कानून और मानवता की बहस को भी नई दिशा देगा।
