
साल 2025 में भी देश की राजधानी दिल्ली को प्रदूषण से राहत नहीं मिल सकी। ताजा आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली पूरे देश की सबसे प्रदूषित राजधानी के रूप में सामने आई है। यहां PM10 का सालाना औसत स्तर 197 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो कि राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से तीन गुना से भी अधिक है। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि राजधानी में रहने वाले करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे की ओर इशारा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में साल भर के दौरान 285 दिन ऐसे रहे, जब वायु प्रदूषण का स्तर तय मानकों से ऊपर दर्ज किया गया। यानी साल के अधिकांश दिन दिल्लीवासियों को जहरीली हवा में सांस लेनी पड़ी। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक इस तरह के प्रदूषण के संपर्क में रहने से सांस की बीमारियां, दमा, हृदय रोग और बच्चों में फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के पीछे वाहनों की संख्या में लगातार इजाफा, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और सर्दियों के मौसम में पराली जलाने का असर प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। हालांकि सरकार और प्रशासन की ओर से कई योजनाएं और प्रतिबंध लागू किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव सीमित ही नजर आया। ग्रैप (GRAP) जैसे कदम लागू होने के बावजूद हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हालात और भी भयावह हो सकते हैं। उन्होंने सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने, इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग, हरित क्षेत्र के विस्तार और निर्माण कार्यों पर सख्त निगरानी की जरूरत बताई है। दिल्ली का प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है, जिस पर तत्काल और प्रभावी कार्रवाई अनिवार्य है।
