यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा– 75 साल बाद भी क्या हम जाति से ऊपर नहीं उठ पाए?

नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए भेदभाव विरोधी नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर अहम सुनवाई हुई। इस दौरान शीर्ष अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आज़ादी के 75 साल बाद भी देश समाज को जाति से मुक्त नहीं कर पाया है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या नए नियम समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेल रहे हैं।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ज्योमाल्या बागची की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि यूजीसी के नए नियमों का सेक्शन 3C जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित करता है। इससे सामान्य वर्ग को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है।याचिकाकर्ता ने कहा कि यह प्रावधान न केवल संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के कई फैसलों से भी टकराता है। उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह की परिभाषा से समाज में वैमनस्य बढ़ेगा और संस्थानों में असंतुलन पैदा होगा।सुनवाई के दौरान रैगिंग से जुड़े मामलों में इन नियमों के संभावित दुरुपयोग का मुद्दा भी उठा। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि देश को यह सोचना होगा कि क्या ऐसे कानून सामाजिक समरसता को मजबूत कर रहे हैं या फिर समाज को और बांट रहे हैं। उन्होंने कहा, “75 साल बाद भी अगर हम जाति से ऊपर नहीं उठ सके, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।”न्यायमूर्ति ज्योमाल्या बागची ने भी सामाजिक न्याय से जुड़े कानूनों में संतुलन बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी कानून में सुरक्षा उपायों का होना जरूरी है ताकि उसका दुरुपयोग न हो।याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यूजीसी के इन नए नियमों पर रोक लगाने और उन्हें रद्द करने की मांग की। अदालत ने संकेत दिए कि इस गंभीर मुद्दे पर कानून विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा विस्तृत विचार किया जाना चाहिए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है।

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