
इंदौर। कभी “विकास का सर्टिफिकेट” पाने वाला इंदौर का भागीरथपुरा इलाका आज बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और सिस्टम की विफलता का प्रतीक बन गया है। दूषित पेयजल से फैले डायरिया और संक्रमण के बाद यहां मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। प्रशासन ने अब तक 6 मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है, जबकि इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने मृतकों की संख्या 10 बताई है। वहीं स्थानीय लोगों का दावा है कि हालात कहीं ज्यादा भयावह हैं और छह महीने के एक मासूम बच्चे समेत अब तक 16 लोगों की जान जा चुकी है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, बीते कई दिनों से क्षेत्र में सप्लाई हो रहे पानी से बदबू आ रही थी और उसका रंग भी बदला हुआ था। इसके बावजूद शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। धीरे-धीरे लोगों में उल्टी-दस्त, बुखार और डायरिया के लक्षण सामने आने लगे। जब तक प्रशासन हरकत में आता, तब तक कई परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके थे। घटना के बाद प्रशासनिक और नगर निगम अमला मौके पर पहुंचा। प्रभावित इलाकों में टैंकर से पानी की आपूर्ति, मेडिकल कैंप और दवाइयों का वितरण शुरू किया गया है। साथ ही पानी के सैंपल लेकर जांच के लिए भेजे गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि दूषित पानी की आपूर्ति रोक दी गई है और हालात नियंत्रण में लाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन केवल आंकड़ों के खेल में उलझा हुआ है। उनका कहना है कि जिन मौतों को बीमारी से जोड़ा जा रहा है, उनमें से कई की जानकारी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं की गई। लोगों का सवाल है कि जिस सिस्टम ने कभी विकास की उपलब्धियों पर खुद ही अपनी पीठ थपथपाई, वही सिस्टम आज समय रहते लोगों की जान क्यों नहीं बचा पाया। भागीरथपुरा की यह त्रासदी न केवल नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कागजों पर दर्ज “स्मार्ट सिटी” और ज़मीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा अंतर है।
