रूसी तेल को लेकर ट्रंप के फैसले से यूरोप नाराज़, कई देशों ने जताई असहमति

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क: रूसी तेल को लेकर अमेरिका के हालिया फैसले से यूरोपीय देशों में नाराज़गी देखने को मिल रही है। यूक्रेन युद्ध के बाद लगाए गए प्रतिबंधों के बीच अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर लगी रोक को 30 दिनों के लिए हटाने के फैसले ने यूरोप में नई बहस छेड़ दी है। कई यूरोपीय देशों ने इस कदम पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि वे इस फैसले से सहमत नहीं हैं।दरअसल, जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ था, तब अमेरिका ने रूस पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए रूसी तेल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस कदम का उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और उसे युद्ध रोकने के लिए मजबूर करना था। अमेरिका के इस फैसले का कई पश्चिमी देशों ने समर्थन भी किया था और रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों की एक श्रृंखला लागू की गई थी।लेकिन हाल के दिनों में मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और अस्थिरता के कारण वैश्विक तेल बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में चिंता बढ़ गई है। इसी को देखते हुए अमेरिका ने रूसी तेल पर लगाए गए प्रतिबंध को अस्थायी तौर पर 30 दिनों के लिए हटाने का फैसला किया है, ताकि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाई जा सके और कीमतों को नियंत्रित किया जा सके।अमेरिका के इस कदम पर यूरोपीय देशों ने नाराज़गी जाहिर की है। कई यूरोपीय नेताओं का कहना है कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को कमजोर करना सही संदेश नहीं देगा। उनका मानना है कि अगर प्रतिबंधों में ढील दी जाती है तो इससे रूस को आर्थिक राहत मिल सकती है, जो यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में सही नहीं माना जा रहा।यूरोपीय देशों ने एक सुर में कहा है कि रूस पर दबाव बनाए रखना जरूरी है और इस तरह के फैसले से पश्चिमी देशों की संयुक्त रणनीति कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने अमेरिका से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की भी अपील की है।विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन में संभावित बाधाओं के कारण तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है। ऐसे में अमेरिका का यह कदम तेल की कीमतों को स्थिर करने के उद्देश्य से उठाया गया माना जा रहा है, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई खींचतान भी देखने को मिल रही है।फिलहाल इस मुद्दे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। आने वाले दिनों में इस फैसले का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति दोनों पर देखने को मिल सकता है।

Amarnath Pathak

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