
यह कहानी किसी हॉलीवुड फिल्म की पटकथा जैसी लगती है, लेकिन हकीकत में इसे एक इंसान ने अपनी जिंदगी में अंजाम दिया था। करोड़ों रुपये लूटने का सपना, आसमान से छलांग और फिर जिंदगी भर का पछतावा—मार्टिन मैकनौली की कहानी अपराध की दुनिया की सबसे अजीब और दर्दनाक कहानियों में गिनी जाती है। वह खुद को कुख्यात डीबी कूपर की तरह इतिहास में दर्ज कराना चाहता था, लेकिन उसका अंजाम उससे कहीं ज्यादा भयावह निकला।.तारीख थी 23 जून, 1972। अमेरिकन एयरलाइंस की फ्लाइट 119 सेंट लुइस से ओक्लाहोमा सिटी की ओर उड़ान भर चुकी थी। विमान में करीब 100 यात्री सवार थे और सब कुछ सामान्य चल रहा था। तभी 28 वर्षीय बेरोजगार युवक मार्टिन मैकनौली ने अचानक एक मशीनगन के दम पर विमान को हाईजैक कर लिया। यात्रियों में अफरा-तफरी मच गई। मैकनौली ने पायलट को आदेश दिया कि उसकी मांगें पूरी की जाएं, नहीं तो अंजाम बुरा होगा।
उसने 5 लाख डॉलर, यानी उस वक्त करीब 4.20 करोड़ रुपये, और दो पैराशूट की मांग रखी। डर के माहौल में उसकी मांगें मान ली गईं। विमान को एक निर्धारित स्थान पर उतारा गया, जहां उसे पैसों से भरा बैग और पैराशूट सौंप दिए गए। इसके बाद उसने विमान को फिर उड़ान भरने का आदेश दिया। जैसे ही जहाज 450 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहा था, मैकनौली ने अचानक आसमान में छलांग लगा दी। यहीं से उसकी कहानी ने खौफनाक मोड़ ले लिया। छलांग लगाते वक्त पैसों से भरा बैग ठीक से बंधा नहीं था। हवा के तेज दबाव में नोटों की गड्डियां आसमान में बिखरने लगीं। करोड़ों रुपये हवा में उड़ गए और नीचे जंगलों व पहाड़ियों में जा गिरे। खुद मैकनौली भी बुरी तरह घायल हो गया, लेकिन किसी तरह जान बचाने में कामयाब रहा। कुछ ही समय बाद वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया। जिस अपराध को वह अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत मान रहा था, वही उसकी सबसे बड़ी सजा बन गया। अदालत ने उसे लंबे कारावास की सजा सुनाई। मैकनौली ने करीब 40 साल जेल की सलाखों के पीछे बिताए। न पैसा उसके काम आया, न शोहरत मिली और न ही वह ‘महान अपराधी’ बन सका, जैसा उसने सपना देखा था। आज, उम्र के इस पड़ाव पर मैकनौली अपने किए पर पछतावा करता है। उसने कई बार स्वीकार किया कि वह सिर्फ डीबी कूपर जैसा बनने के जुनून में अंधा हो गया था। करोड़ों रुपये लूटने की चाहत ने उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी। यह कहानी एक कड़वी सीख है कि अपराध का रास्ता चाहे कितना भी रोमांचक क्यों न लगे, उसका अंत अक्सर पछतावे और अंधेरे के अलावा कुछ नहीं होता।
