
राजस्थान के जालौर जिले में 24 गांवों में महिलाओं के स्मार्टफोन इस्तेमाल पर कथित रोक को लेकर वायरल हुई खबरों के बाद अब पंचायत और समाज के प्रतिनिधियों ने स्थिति स्पष्ट की है। समाज के पांच पटेलों ने कहा है कि महिलाओं के स्मार्टफोन पर कोई प्रतिबंध लगाने का फैसला नहीं लिया गया था, बल्कि यह केवल एक सुझाव था, जिस पर 26 जनवरी तक समाज से राय मांगी गई थी।
पटेलों के अनुसार, यह प्रस्ताव बच्चों पर मोबाइल फोन के बढ़ते दुष्प्रभाव को ध्यान में रखते हुए सामने आया था। चर्चा के दौरान कुछ महिलाओं ने स्वयं यह सुझाव रखा था कि मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों की पढ़ाई और व्यवहार प्रभावित हो रहा है। इसी संदर्भ में समाज के स्तर पर राय जानने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

हालांकि, सोशल मीडिया पर यह खबर फैलने के बाद कि पंचायत ने महिलाओं के स्मार्टफोन इस्तेमाल पर बैन लगा दिया है, मामले ने तूल पकड़ लिया। विरोध और आलोचना के बीच अब समाज के प्रतिनिधियों ने साफ किया है कि यह न तो कोई लिखित आदेश था और न ही बाध्यकारी निर्णय। पटेलों ने कहा कि समाज में किसी भी प्रकार का निर्णय सहमति और विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाता है। सोशल मीडिया पर गलत तरीके से प्रस्तुत की गई जानकारी के कारण भ्रम की स्थिति बनी, जिसे देखते हुए यह प्रस्ताव फिलहाल वापस ले लिया गया है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर डिजिटल जागरूकता, सामाजिक संवाद और अफवाहों के प्रभाव पर बहस छेड़ दी है। प्रशासनिक स्तर पर भी स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं के मोबाइल इस्तेमाल पर किसी तरह की आधिकारिक रोक नहीं है।
