
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में कांग्रेस सरकार द्वारा की गई बुलडोजर कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। सरकारी एजेंसियों ने शहर के विभिन्न इलाकों में 400 से अधिक घरों को अवैध निर्माण बताते हुए ध्वस्त कर दिया, जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों के मकान शामिल बताए जा रहे हैं। इस कार्रवाई के बाद विपक्षी दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक ने सरकार के फैसले पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकार का पक्ष
कर्नाटक सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है। प्रशासन के अनुसार जिन मकानों पर बुलडोजर चलाया गया, वे सरकारी जमीन, झील क्षेत्र या राजस्व रिकॉर्ड में अवैध रूप से निर्मित पाए गए थे। सरकार का दावा है कि पहले नोटिस जारी किए गए थे और उसके बाद ही यह कदम उठाया गया।
विपक्ष का आरोप
विपक्षी दलों ने सरकार पर चुनिंदा समुदाय को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि बुलडोजर कार्रवाई निष्पक्ष नहीं है और इससे अल्पसंख्यक समुदाय में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ है। बीजेपी और अन्य दलों ने इसे “दोहरे मापदंड” करार देते हुए कांग्रेस पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाया है।
केरल के मुख्यमंत्री ने जताई नाराजगी
इस मुद्दे पर पड़ोसी राज्य केरल के मुख्यमंत्री ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कर्नाटक सरकार की इस कार्रवाई की खुलकर आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में इस तरह की कठोर कार्रवाई मानवीय मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था पर भी सरकार ने विचार किया।
स्थानीय लोगों का दर्द
बुलडोजर कार्रवाई से प्रभावित लोगों का कहना है कि वे वर्षों से इन मकानों में रह रहे थे और उनके पास रहने का कोई अन्य ठिकाना नहीं है। कई परिवार खुले आसमान के नीचे आ गए हैं, जिससे मानवीय संकट की स्थिति बन गई है।
राजनीतिक माहौल गरम
इस कार्रवाई के बाद कर्नाटक की राजनीति में तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा विधानसभा से लेकर सड़क तक गूंजने के आसार हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या बुलडोजर कार्रवाई कानून व्यवस्था का हिस्सा है या फिर राजनीतिक संदेश देने का तरीका?
