
रूस की राजधानी मॉस्को समेत कई बड़े शहरों में लग्जरी कार मालिकों के बीच हड़कंप मच गया है। जर्मनी में बनी पोर्श और BMW जैसी महंगी कारें अचानक स्टार्ट होना बंद कर रही हैं या चलते-चलते खुद ही लॉक हो जा रही हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह समस्या किसी मैकेनिकल खराबी की नहीं, बल्कि कथित तौर पर रूस की खुफिया तकनीक से जुड़ी बताई जा रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2013 से 2019 के बीच बने Porsche मॉडल्स और BMW की कई सीरीज — जैसे 1 से 7 सीरीज, X1 से X6, Z4, i3, i8 और M-सीरीज — अचानक काम करना बंद कर रही हैं। इन सभी कारों में कनेक्टेड ड्राइव और टेलीमैटिक्स कंट्रोल यूनिट (TCU) लगी होती है, जो इंटरनेट और सैटेलाइट सिग्नल के जरिए कार को कंट्रोल करती है।
कैसे हो रही है कारें लॉक?
सूत्रों का दावा है कि रूस की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (Electronic Warfare – EW) सिस्टम्स इन कारों के व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम की फ्रीक्वेंसी में दखल दे रही हैं। जब सिस्टम को किसी तरह की असामान्य या संदिग्ध गतिविधि महसूस होती है, तो कार का सिक्योरिटी सिस्टम इसे चोरी की कोशिश मान लेता है और इंजन को लॉक कर देता है। यानी कार खुद ही यह मान लेती है कि उसे हैक किया जा रहा है — और सुरक्षा के तौर पर स्टार्ट होने से मना कर देती है।
क्या वाकई ‘पुतिन का साइबर हथियार’ जिम्मेदार?
हालांकि अभी तक रूस की सरकार या सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन टेक एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह संभव है। आधुनिक कारें इंटरनेट, GPS और सैटेलाइट सिग्नल पर निर्भर होती हैं। अगर किसी ताकतवर इलेक्ट्रॉनिक जामिंग सिस्टम से इन सिग्नल्स को बाधित किया जाए, तो कार का सिस्टम फेल हो सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं को लेकर पहले भी कई रिपोर्ट्स सामने आ चुकी हैं। ऐसे में यह आशंका और मजबूत हो जाती है कि इन तकनीकों का असर आम नागरिकों की गाड़ियों तक पहुंच रहा है।
कार मालिकों में डर का माहौल
इस घटना के बाद रूस में लग्जरी कार मालिकों में डर का माहौल है। कई लोग अपनी गाड़ियां स्टार्ट ही नहीं कर पा रहे हैं, तो कुछ ने सर्विस सेंटर में कार खड़ी कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन गाड़ियों में रिमोट कनेक्टिविटी ज्यादा है, वे इस तरह की तकनीकी दखल के लिए ज्यादा संवेदनशील हैं।
आगे क्या?
ऑटोमोबाइल कंपनियां फिलहाल चुप हैं, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले समय में सॉफ्टवेयर अपडेट या सैटेलाइट फ्रीक्वेंसी से जुड़ा कोई समाधान निकाला जा सकता है। फिलहाल यह मामला टेक्नोलॉजी, जियोपॉलिटिक्स और साइबर वॉरफेयर के खतरनाक मेल की एक झलक बन चुका है।
