बड़कागांव क्षेत्र में कोल खनन के खिलाफ ग्रामीणों का संघर्ष अब और तेज हो गया है। बहुफसली जमीन को बचाने के लिए ग्रामीण बीते 1013 दिनों से लगातार धरने पर बैठे हुए हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका है। बुधवार को पर्यावरण समिति, प्रशासन और ग्रामीणों के बीच प्रस्तावित त्रिपक्षीय वार्ता भी विफल हो गई, जिसके बाद इलाके में तनाव और नाराजगी का माहौल बन गया। धरने पर बैठे ग्रामीणों का कहना है कि “खदानें मौत देती हैं और खेत जीवन”। उनका साफ कहना है कि उनकी जमीन बहुफसली है, जहां धान, सब्ज़ी और ईख की पैदावार होती है। इसी जमीन से उनकी आजीविका चलती है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य जुड़ा है। ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे किसी भी कीमत पर खनन नहीं होने देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े।
ग्रामीणों ने बताया कि बड़कागांव कभी धान का कटोरा कहा जाता था, जबकि गोंडलपुरा क्षेत्र ईख और गुड़ के उत्पादन के लिए पूरे इलाके में मशहूर रहा है। लेकिन कोल खनन परियोजना से खेती, पर्यावरण और जल स्रोतों के खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। उनका कहना है कि अगर खनन हुआ तो न सिर्फ किसानों की रोज़ी-रोटी छिनेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र की पहचान भी खत्म हो जाएगी।
धरनास्थल पर मौजूद लोगों ने प्रशासन और कंपनी पर गंभीर आरोप लगाए। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी बात सुने बिना जबरन परियोजना थोपने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अब आंदोलन और तेज किया जाएगा और जरूरत पड़ी तो बड़ा जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। त्रिपक्षीय वार्ता टूटने के बाद हालात और संवेदनशील हो गए हैं। ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि जब तक खनन परियोजना रद्द नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। आने वाले दिनों में बड़कागांव में आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।
