अक्सर देखा जाता है कि ज्यादातर लिफ्ट के अंदर शीशे लगे होते हैं। बहुत से लोग इसे केवल चेहरा देखने या बाल ठीक करने की सुविधा मानते हैं, लेकिन इसके पीछे कई वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारण भी जुड़े हैं।विशेषज्ञों के अनुसार बंद धातु के डिब्बे जैसी जगह में ऊपर–नीचे सफर करना कई लोगों को असहज महसूस करा सकता है। लिफ्ट में आमतौर पर खिड़कियां नहीं होतीं, जिससे जगह सीमित और बंद महसूस होती है। ऐसे में शीशा लगाने से अंदर का स्पेस बड़ा नजर आता है और लोगों को मानसिक रूप से आराम मिलता है।शीशे का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य क्लॉस्ट्रोफोबिया यानी बंद जगहों के डर को कम करना भी है। जब व्यक्ति को आसपास का दृश्य विस्तृत दिखता है, तो घबराहट कम होती है और सफर अधिक सहज बनता है।सुरक्षा के लिहाज से भी शीशा उपयोगी माना जाता है। लिफ्ट में खड़े लोग अपने पीछे खड़े व्यक्तियों की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं, जिससे संदिग्ध हरकतों की संभावना कम हो जाती है। इसके अलावा व्हीलचेयर उपयोग करने वाले लोगों के लिए शीशा रियर व्यू की तरह काम करता है, जिससे उन्हें लिफ्ट के अंदर घूमने और बाहर निकलने में आसानी होती है।इंटीरियर डिजाइन के दृष्टिकोण से भी शीशा लिफ्ट को अधिक आकर्षक और खुला रूप देता है। कुछ लिफ्ट में पूरा शीशा न लगाकर चमकदार सतह बनाई जाती है, जिससे प्रतिबिंब दिखाई देता रहे।इस तरह लिफ्ट में लगे शीशे केवल सजावट का हिस्सा नहीं, बल्कि सुविधा, सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तत्व हैं।
लिफ्ट में शीशे क्यों लगे होते हैं? सुविधा, सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक कारणों का सच
