
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि अगर ईरान और अमेरिका के बीच सीधी सैन्य टकराव की स्थिति बनती है, तो ईरान कितना तैयार है और उसके पास किस तरह की सैन्य ताकत मौजूद है। ईरान लंबे समय से अमेरिकी दबाव, प्रतिबंधों और सैन्य घेराबंदी का सामना करता आ रहा है, जिसके चलते उसने अपनी रक्षा रणनीति को क्षेत्रीय प्रभुत्व और असममित युद्ध क्षमता पर केंद्रित किया है। ईरान की सैन्य शक्ति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कमतर नहीं आंका जाता। वर्ष 2025 की ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग में ईरान दुनिया के ताकतवर देशों की सूची में 16वें स्थान पर है। यह रैंकिंग उसकी थलसेना, वायुसेना, नौसेना, मिसाइल क्षमता और रणनीतिक संसाधनों को ध्यान में रखकर दी गई है। ईरान के पास बड़ी संख्या में प्रशिक्षित सैनिक हैं और उसकी सैन्य संरचना में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की अहम भूमिका मानी जाती है, जो पारंपरिक सेना से अलग और अधिक आक्रामक रणनीति के लिए जानी जाती है। हथियारों की बात करें तो ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी मिसाइल और ड्रोन क्षमता है। उसके पास हजारों की संख्या में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं, जिनमें कम दूरी और मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें शामिल हैं। ये मिसाइलें अमेरिकी सैन्य ठिकानों, नौसैनिक बेड़ों और सहयोगी देशों के ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम मानी जाती हैं। इसके अलावा ईरान ने ड्रोन तकनीक में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। उसके आत्मघाती ड्रोन और निगरानी ड्रोन पहले ही कई संघर्षों में प्रभावी साबित हो चुके हैं।

हालांकि, भौगोलिक दूरी ईरान की एक बड़ी सीमा है। ईरान और अमेरिका के बीच सीधी दूरी बहुत अधिक है, जिससे ईरान सीधे अमेरिकी मुख्य भूमि को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। लेकिन रणनीतिक रूप से ईरान की योजना अमेरिका को उसके ही क्षेत्रीय ठिकानों के जरिए चुनौती देने की है। मध्य पूर्व के कई अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे ईरान की पहुंच में हैं और किसी भी संघर्ष की स्थिति में ये ठिकाने उसका प्रमुख निशाना बन सकते हैं।
इसके उलट अमेरिका के लिए दूरी कोई बड़ी समस्या नहीं है। उसकी वैश्विक सैन्य मौजूदगी, अत्याधुनिक वायुसेना, नौसेना और सटीक हमले करने की क्षमता उसे किसी भी क्षेत्र में त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम बनाती है। अमेरिका के पास विमानवाहक पोत, लंबी दूरी के बमवर्षक और मिसाइल रक्षा प्रणाली है, जो उसे सैन्य बढ़त दिलाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होता है, तो यह पारंपरिक युद्ध से ज्यादा क्षेत्रीय और अप्रत्यक्ष टकराव का रूप ले सकता है। ईरान अपने सहयोगी गुटों और संगठनों के जरिए अमेरिका और उसके साझेदारों पर दबाव बना सकता है, जबकि अमेरिका तकनीकी और सैन्य शक्ति के दम पर ईरान की रणनीतिक क्षमताओं को कमजोर करने की कोशिश करेगा। कुल मिलाकर, ईरान पूरी तरह से अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता, लेकिन वह मध्य पूर्व में अमेरिका के लिए गंभीर चुनौती जरूर खड़ी कर सकता है।
