
महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में महायुति गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया। हालांकि, इस चुनाव के परिणामों में एक और विशेष पहलू सामने आया, जो राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय बनता दिख रहा है—यह है परिवारवाद का बढ़ता दबदबा।चुनाव के दौरान कई सीटें नेताओं के परिजनों के खाते में गईं। एक व्यक्ति की लोकप्रियता या कार्यकर्ता नेटवर्क का पुराने फॉर्मूले का असर अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब चुनाव कार्यकर्ताओं के बजाय नेताओं के परिवारों के इर्द-गिर्द केन्द्रित होते जा रहे हैं।

भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट), एनसीपी (अजित पवार गुट) और कुछ अन्य दलों ने अपने नेताओं के परिवार को चुनाव मैदान में उतारा, जिसमें कई ने जीत हासिल की। वहीं, कुछ उम्मीदवारों को अपनी किस्मत पर भरोसा करना पड़ा और उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह प्रवृत्ति महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति में लंबे समय तक छाया डाल सकती है। युवा और नए चेहरे इस पारंपरिक परिवारवाद की राजनीति में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि पारिवारिक दबदबा धीरे-धीरे मजबूत होता जा रहा है।
