
आज के समय में नौकरीपेशा लोगों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि सैलरी तो समय पर आती है, लेकिन महीने के अंत तक जेब खाली हो जाती है। बढ़ती महंगाई, अनियोजित खर्च और निवेश की कमी के कारण लोग बचत नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में नए साल की शुरुआत में अगर सही फाइनेंशियल प्लानिंग को अपनाया जाए, तो कुछ ही महीनों में आर्थिक स्थिति मजबूत की जा सकती है। रांची के फाइनेंशियल और म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट रवि के अनुसार, 60-20-10-10 फॉर्मूला आम लोगों के लिए बेहद कारगर साबित हो सकता है। यह फॉर्मूला न सिर्फ बचत सिखाता है, बल्कि भविष्य के लिए निवेश और वर्तमान की जरूरतों के बीच संतुलन भी बनाता है।

इस फॉर्मूले में सैलरी का 60 प्रतिशत हिस्सा जरूरी खर्चों के लिए तय किया जाता है। इसमें घर का किराया, राशन, बिजली-पानी के बिल, बच्चों की फीस और अन्य अनिवार्य खर्च शामिल होते हैं। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति एक सख्त बजट बनाए और उसी के अनुसार खर्च करे।

सैलरी का 20 प्रतिशत हिस्सा लॉन्ग टर्म निवेश के लिए रखा जाता है। इसमें रिटायरमेंट प्लानिंग, म्यूचुअल फंड, पीपीएफ या अन्य दीर्घकालीन निवेश विकल्प शामिल किए जा सकते हैं। यह हिस्सा भविष्य की आर्थिक सुरक्षा की नींव मजबूत करता है।.इसके बाद सैलरी का 10 प्रतिशत हिस्सा शॉर्ट टर्म सेविंग्स के लिए अलग रखने की सलाह दी जाती है। इसमें इमरजेंसी फंड, इंश्योरेंस प्रीमियम और सामान्य बचत शामिल होती है। अचानक गाड़ी खराब होने, मेडिकल इमरजेंसी या अन्य अप्रत्याशित खर्चों के समय यही छोटी-छोटी बचत बड़े काम आती है।

सैलरी का अंतिम 10 प्रतिशत हिस्सा खुद पर खर्च करने के लिए रखा जाता है। इसमें घूमना-फिरना, बाहर खाना, कपड़े खरीदना या अपने शौक पूरे करना शामिल है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि मानसिक संतुलन और खुशी भी फाइनेंशियल हेल्थ का अहम हिस्सा है।.रवि बताते हैं कि जैसे-जैसे सैलरी बढ़े, उसी अनुपात में इस फॉर्मूले को सख्ती से लागू करना चाहिए और निवेश की राशि बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। इससे आने वाले वर्षों में इसका जबरदस्त फायदा देखने को मिलेगा।

हालांकि, अगर किसी की जरूरतें कम हैं या वह बैचलर है, तो वह जरूरी खर्चों के लिए 60 प्रतिशत की जगह 50 या 40 प्रतिशत भी तय कर सकता है। प्रतिशत में बदलाव व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार किया जा सकता है, लेकिन सबसे जरूरी है कि तय किए गए नियमों का सख्ती से पालन किया जाए।
