स्वामी दिव्यज्ञान
बांग्लादेश में 2024 के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है। प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन्होंने एक दशक से अधिक समय तक देश की बागडोर संभाली, अगस्त 2024 में इस्तीफा देकर भारत में शरण ली। उनके इस्तीफे के बाद, बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसमें नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस को नेतृत्व सौंपा गया। यह बदलाव न केवल बांग्लादेश के लिए, बल्कि भारत और पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक बड़ा घटनाक्रम है। इस संकट के बहुआयामी प्रभावों ने भारत के लिए कूटनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी कई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
शेख हसीना और भारत का संबंध
शेख हसीना के कार्यकाल को भारत-बांग्लादेश संबंधों के स्वर्णिम युग के रूप में देखा जाता है।
- सीमा पर सहयोग: शेख हसीना के कार्यकाल में भारत और बांग्लादेश ने उग्रवाद और सीमा पार अपराधों पर कड़ी कार्रवाई की। पूर्वोत्तर भारत के लिए यह सहयोग रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।
- आर्थिक साझेदारी: दोनों देशों के बीच व्यापार $10 बिलियन के पार पहुँच गया। भारत ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया।
- रणनीतिक संतुलन: शेख हसीना ने चीन के प्रभाव को संतुलित करते हुए भारत के साथ गहरे संबंध बनाए रखे।
उनका इस्तीफा भारत के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि उनके बाद की सरकार की नीतियाँ भारत के हितों से मेल नहीं खा सकतीं।
भारत के सामने कूटनीतिक चुनौतियाँ
(1) शेख हसीना का प्रत्यर्पण
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है।
प्रत्यर्पण के पक्ष में:
बांग्लादेश के साथ संबंध बनाए रखने का अवसर।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की छवि।
प्रत्यर्पण के विरोध में:
शेख हसीना को निष्पक्ष न्याय मिलने की संभावना कम है।
उनका प्रत्यर्पण भारत समर्थक समुदाय और हिंदू अल्पसंख्यकों के विश्वास को कमजोर कर सकता है।
(2) जमात-ए-इस्लामी की पुनर्सक्रियता
अंतरिम सरकार ने जमात-ए-इस्लामी पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है।
यह समूह बांग्लादेश में कट्टरपंथ को बढ़ावा देता है, जिसका असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ सकता है।
(3) अल्पसंख्यकों पर हमले
हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले भारत के लिए कूटनीतिक और मानवीय चुनौती हैं।
भारत के लिए यह सवाल है कि क्या वह इन मुद्दों को उठाए, या बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संबंध खराब होने के डर से चुप रहे।
सीमा सुरक्षा और आंतरिक दुविधा
(1) शरणार्थी संकट
बांग्लादेश में अस्थिरता के कारण बड़ी संख्या में लोग भारत की ओर पलायन कर सकते हैं।
असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों पर सामाजिक और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
(2) कट्टरवाद और आतंकवाद
जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी समूहों के सक्रिय होने से सीमा पार आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी बढ़ सकती है।
(3) पूर्वोत्तर राज्यों पर प्रभाव
बढ़ती घुसपैठ और शरणार्थी समस्या से पूर्वोत्तर में अलगाववादी भावनाएँ और असंतोष उभर सकता है।
भारत की आंतरिक राजनीति और सामाजिक प्रभाव
(1) नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA)
हिंदू शरणार्थियों के आगमन से CAA के मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो सकती है।
पूर्वोत्तर राज्यों में स्थानीय समुदाय इसे संसाधनों पर बोझ मान सकते हैं।
(2) सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
हिंदू शरणार्थियों का समर्थन और मुस्लिम प्रवासियों का विरोध, राजनीतिक दलों द्वारा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
आर्थिक प्रभाव
(1) व्यापार और कनेक्टिविटी पर असर
बांग्लादेश की अस्थिरता ने सीमा पर व्यापारिक गतिविधियों को बाधित किया है।
भारत द्वारा वित्त पोषित कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर भी अनिश्चितता छा गई है।
(2) संसाधनों पर दबाव
शरणार्थियों के आगमन से सीमावर्ती राज्यों में बुनियादी सेवाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा, और रोजगार) पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत की रणनीतिक भूमिका और समाधान
(1) सीमा सुरक्षा को मजबूत करना
तकनीकी निगरानी (ड्रोन, सेंसर) और BSF की उपस्थिति को बढ़ाना।
सीमा पर बाड़बंदी को जल्द से जल्द पूरा करना।
(2) शरणार्थी नीति
शरणार्थियों का पंजीकरण और अस्थायी शिविरों का निर्माण।
स्थानीय समुदायों के साथ सामंजस्य स्थापित करना।
(3) कूटनीतिक संवाद
अंतरिम सरकार के साथ सहयोग बढ़ाकर हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश की स्थिरता के लिए दबाव बनाना।
(4) आर्थिक भागीदारी
बांग्लादेश की आर्थिक स्थिरता में मदद करना, ताकि भारत के हित सुरक्षित रहें।
निष्कर्ष
बांग्लादेश संकट भारत के लिए एक जटिल चुनौती है, जो कूटनीति, सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता से जुड़ी हुई है। भारत को सूझबूझ के साथ इन चुनौतियों का सामना करना होगा।
शेख हसीना का समर्थन करते हुए भारत को बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने होंगे।
सीमा सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए, शरणार्थियों और घुसपैठ से निपटने के लिए मजबूत नीतियाँ बनानी होंगी।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाकर, बांग्लादेश में लोकतंत्र और स्थिरता को बढ़ावा देने के प्रयास करने होंगे।
बांग्लादेश और भारत का भविष्य आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत के निर्णय न केवल उसके राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करेंगे, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता और प्रगति में योगदान देंगे।