
भगोड़े कारोबारी विजय माल्या से जुड़े बहुचर्चित आर्थिक अपराध मामले में एक बार फिर अदालत में सुनवाई शुरू हो गई है। इस सुनवाई के दौरान बैंकों की ओर से की गई कथित वसूली, फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर (FEO) एक्ट के तहत जारी कार्रवाई और माल्या की कानूनी स्थिति को लेकर अहम सवाल उठे। अदालत में विजय माल्या के वकील ने दावा किया कि भारतीय बैंकों का लगभग पूरा बकाया वसूल किया जा चुका है। वकील का कहना था कि विभिन्न कानूनी प्रक्रियाओं और संपत्तियों की नीलामी के जरिए बैंकों को करीब 14 हजार करोड़ रुपये की रिकवरी हो चुकी है, जो मूल कर्ज राशि से अधिक बताई जा रही है। इसी आधार पर उन्होंने माल्या के खिलाफ चल रही कुछ कार्रवाइयों पर पुनर्विचार की मांग की।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट सवाल किया कि विजय माल्या के खिलाफ फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर एक्ट के तहत नोटिस अभी भी प्रभावी है या नहीं। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और अन्य संबंधित एजेंसियों से इस पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। कोर्ट यह जानना चाहती है कि जब बैंकों की वसूली का दावा किया जा रहा है, तब FEO एक्ट के तहत जारी कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है। गौरतलब है कि विजय माल्या पर किंगफिशर एयरलाइंस से जुड़े करीब 9,000 करोड़ रुपये के लोन घोटाले का आरोप है। उन पर धोखाधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग और बैंकों के साथ विश्वासघात जैसे गंभीर आरोप दर्ज हैं। मार्च 2016 में वे भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए थे, जिसके बाद से उन्हें भारत लाने के लिए प्रत्यर्पण की प्रक्रिया भी चल रही है।

प्रवर्तन निदेशालय का कहना है कि माल्या की कई संपत्तियां जब्त कर नीलाम की गई हैं और रिकवरी की प्रक्रिया कानून के तहत की गई है, लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि वे एक भगोड़े आर्थिक अपराधी घोषित किए जा चुके हैं। एजेंसियों का तर्क है कि कानून के तहत की गई कार्रवाई केवल वसूली तक सीमित नहीं होती, बल्कि अपराध की जवाबदेही तय करना भी उसका उद्देश्य है।
इस मामले की अगली सुनवाई में अदालत यह तय कर सकती है कि FEO एक्ट के तहत जारी नोटिस को जारी रखा जाए या नहीं, साथ ही वसूली के दावों की वास्तविक स्थिति क्या है। यह केस न केवल आर्थिक अपराधों के खिलाफ भारत की कानूनी लड़ाई का प्रतीक है, बल्कि भगोड़े आरोपियों से निपटने की नीति के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
