झारखंड की जनजाति संस्कृति से जुड़ी है सूर्योपासना एवं जल स्रोतों की शुद्धि

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डा. गंगा नाथ झा
सूर्य सृष्टि का आधार है। मानव की उत्पत्ति जिस पृथ्वी पर हुई है, वह भी सूर्य के बल से गतिमान है। सूर्य के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। जीवन हो या फिर मानव के उद्विकास की कहानी, सब कुछ सूर्य से जुड़ा है। धर्म की उत्पत्ति के कई सिद्धांत हैं। इसमें से प्रकृतिवाद भी एक है। मानव द्वारा प्रकृति की पूजा आदिकाल से की जाती रही है। सूर्य की पूजा साक्षात प्राकृतिक शक्ति की पूजा है, जिसने मानव जीवन को अस्तित्व में बनाए रखा है। सूर्य की महत्ता हर धर्म में है। सनातन धर्मावलंबियों द्वारा सूर्य की मूर्ति की पूजा के साक्ष्य बिहार के देव मंदिर जैसे कई प्राचीन मंदिरों में मौजूद हैं। भारत का शाक्यद्विपीय समाज तो सूर्य को अपना कुल देवता मानता है। इस समाज के लोग स्वयं को सूर्य से जोड़कर देखते हैं।


सूर्य को जल का अर्घ्य देने की परंपरा भारतवर्ष में अनादिकाल से प्रचलित है। आज भी पूर्वी भारत में छठ पर्व के अवसर पर जल के किनारे सूर्य की आराधना पर की जाती है। अब यह आराधना वृहद् रूप से विश्व स्तर पर होने लगी है। इसका कारण स्पष्ट है कि संपूर्ण मानव जगत अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सूर्य के सानिध्य में रहकर मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करना चाहता है। सूर्य की उपासना के लिए प्रदूषण मुक्त स्वच्छ जल की महत्ता सर्व विदित है। लेकिन इन दिनों जल प्रदूषण समाज के लिए चिंता का विषय है। तालाब से लेकर नदियां, अतिक्रमण और प्रदूषण का शिकार हो गई है। अब तो प्रदूषण से समुद्र देवता भी मुक्त नहीं हैं। छठ पूजा के एक दिन पहले तालाब की सफाई के बाद पुनः छठ पर्व समाप्त होते ही नदी और तालाब में फेंके जाने वाली गंदगी न केवल सभ्य समाज को कलंकित करती है बल्कि धार्मिक कर्मकांडों के औचित्य पर भी प्रश्न खड़े करती है। सभ्य समाज के शिखर को छूने वाले मानव का यह कृत्य चिंतनीय है। लेकिन ऐसे समय में झारखण्ड के जनजाति समाज से संपूर्ण मानव जगत को प्रतिदिन सूर्य की पूजा और जल की स्वच्छता बनाए रखने के संदेश अनुकरणीय है।
मुण्डा जनजाति समाज में सिंग बोंगा की पूजा सर्वशक्तिमान अदृश्य शक्ति के रूप में की जाती है। मुण्डा जनजाति द्वारा सिंग बोंगा के अलावे सिंगी बोंगा की भी पूजा की जाती है. सिंगी बोंगा ही सूर्य है, जिनसे जीवन जुड़ा है। मुण्डा जनजाति में सिंगी बोंगा की पूजा-अर्चना हर रोज की जाती है। घर का आंगन हो या फिर स्नान के लिए डारी- चुआ़ जैसा प्राकृतिक जल स्रोतों का स्थान, स्नान के बाद सिंगी बोंगा की आराधना इस जनजाति के नित्य धार्मिक क्रियाकलापों में शामिल है। मुण्डा जनजाति की तरह ही उरांव जनजाति में भी सूर्य की पूजा की जाती है। इस समाज में सूर्य को धर्मेश कहा जाता है जो सर्वशक्तिमान हैं। धर्मेश की पूजा हर रोज की जाती है लेकिन सप्ताह में एक दिन,गुरुवार को विशेष पूजा की जाती है। इस दिन खेत में हल और कुदाल चलाना वर्जित है। अतएव प्राकृतिक जल संसाधनों की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जनजाति समाज के सभी सदस्य अपने स्तर पर हर दिन प्रयास करते हैं। प्राकृतिक जल स्रोत में कोई भी चीज फेंकना वर्जित है। प्राकृतिक जल स्रोतों के आसपास के जंगल झाड़ और गंदगी को साफ कर जल की स्वच्छता बनाए रखना, समाज के सभी सदस्यों का कर्तव्य होता है। पीने का पानी हो या स्नान के उपरांत पूजा -पाठ के लिए जल, सभी इन्हीं जल स्रोतों से प्राप्त होता है। सरना स्थल की पूजा भी इन्हीं जल स्रोतों से प्राप्त जल से की जाती है। समाज के सभी सांस्कृतिक क्रियाकलापों में शुद्ध जल की आवश्यकता होती है। इसके लिए प्रदूषण मुक्त शुद्ध जल स्रोतों का होना अति आवश्यक है। जनजाति समाज के सभी सदस्य जिस प्रकार दैनिक जीवन में पर्यावरण एवं जल स्रोतों की शुद्धता बनाए रखने में अपनी भूमिका सुनिश्चित करते हैं, वह तथाकथित सभ्य एवं उन्नत समाज के लोगों के लिए अनुकरणीय है ।

(लेखक विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग में मानव विज्ञान के प्राध्यापक हैं।)

Amarnath Pathak

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